भले गंगा के या जमुना के तीरे
चदरिया बुनने फिर आ जा कबीरे
पवन के पुत्र की फिर से
परीक्षा
वो अपना वक्ष कितनी बार चीरे
वो शबरी और विदुर की खोज में
है
बजाओ लाख तुम झाँझ और मँजीरे
उसे हल्के में तुम ले तो रहे
हो
वो कछुआ है चलेगा धीरे धीरे
समक्ष इनके है हर धन धूल
जैसा
सुभाषित मन्त्र हैं अनमोल हीरे
वो अपना वक्ष कितनी बार चीरे
बजाओ लाख तुम झाँझ और मँजीरे
वो कछुआ है चलेगा धीरे धीरे
सुभाषित मन्त्र हैं अनमोल हीरे
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