आत्म से अनभिज्ञ हैं अंतःकरण सिखला रहे हैं
खाट पर लेटे हुए हैं जागरण
सिखला रहे हैं
दूध से परिचय नहीं पर
शास्त्र लिख मारे दही पर
रूप तो समझे नहीं रूपान्तरण सिखला रहे हैं
शत्रु दल को देखते ही जो
बिलों में घुस गये थे
आज हम जैसों को वे जीवन-मरण सिखला रहे हैं
आचरण के अक्षरों का मर्म तक
समझे नहीं जो
वे दुराचारी हमें अब आचरण सिखला रहे हैं
अपनी अंटी से कभी फूटी
चवन्नी तक न निकली
कर रहे हैं संग्रहण, हस्तांतरण सिखला रहे हैं
रूप तो समझे नहीं रूपान्तरण सिखला रहे हैं
आज हम जैसों को वे जीवन-मरण सिखला रहे हैं
वे दुराचारी हमें अब आचरण सिखला रहे हैं
कर रहे हैं संग्रहण, हस्तांतरण सिखला रहे हैं
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