धवल मुखचन्द्र पर जब श्याम कुन्तल नृत्य करते हैं
तो यों लगता है ज्यों लहरा
के बादल नृत्य करते हैं
सभा सावन सजाये और पावस हो
पखावज पर
गगन कहता है तत् तत् थेइ जल थल नृत्य करते हैं
सरोवर में कभी हंसों के जोड़े
का प्रणय देखो
हृदय जिनके हों निश्छल वे ही निर्मल नृत्य करते हैं
कोई संकल्प कर ले तो असम्भव
कुछ नहीं प्रियवर
यहाँ चरणों से वंचित शीश के बल नृत्य करते हैं
पतंजलि जैसा जब कोई धरा पर
जन्म लेता है
मगन हो जाते हैं बरगद औ पीपल नृत्य करते हैं
भले अमृत गटक कर भी जगत उलझा
रहे लेकिन
जगत के मित्र शिव पी कर हलाहल नृत्य करते हैं
गगन कहता है तत् तत् थेइ जल थल नृत्य करते हैं
हृदय जिनके हों निश्छल वे ही निर्मल नृत्य करते हैं
यहाँ चरणों से वंचित शीश के बल नृत्य करते हैं
मगन हो जाते हैं बरगद औ पीपल नृत्य करते हैं
जगत के मित्र शिव पी कर हलाहल नृत्य करते हैं
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