परिचय - नवीन सी. चतुर्वेदी

परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी

नवीन सी चतुर्वेदी की हिन्दीगजल के विषय में विज्ञान व्रत जी के विचार

अपनी कोमलतम भावनाओं को नवीन सी. चतुर्वेदी संस्कृतनिष्ठ किन्तु सहज भाषा में अभिव्यक्त करते हैं. मुझे पूर्ण विश्वास है कि नवीन सी. चतुर्वेदी की इन हिन्दीगजलों को पाठक हाथोंहाथ लेंगे.

नवीन सी चतुर्वेदी की हिन्दीगजल के विषय में मयंक अवस्थी जी के विचार

नवीन सी. चतुर्वेदी ने हिन्दी गजल के जिस स्वरूप को विकसित करने का प्रयास किया है, वह एक राजमार्ग का आरम्भ भी हो सकता है. इनकी हिन्दी गजल यह प्रमाण देती है कि हाँ, यह हमारी बेटी है, जिसने परिवार की भाषा और संस्कार सीख लिया है और अब वह अपने परिवेश से सार्थक सम्वाद कर सकती है.

नवीन सी चतुर्वेदी की हिन्दीगजल के विषय में देवमणि पाण्डेय जी के विचार

नवीन सी चतुर्वेदी की हिन्दीगजलों में नयापन है, ताजगी है और कथ्य की विशिष्टता है. ये गजलें उस मोड़ का पता देती हैं जहां से हिंदीगजल का एक नया कारवाँ शुरू होगा. ये हिन्दीगजलें प्रथम दृष्टि में शास्त्रीय संगीत की तरह दुरूह लगती हैं मगर जब आप इन के समीप जाते हैं, इन्हें महसूस करते हैं तो इनमें निहित विचारों और भावनाओं की खुशबू से आपका मन महकने लगता है।

नवीन सी चतुर्वेदी की हिन्दीगजल के विषय में के. पी. अनमोल जी के विचार

नवीन सी चतुर्वेदी द्वारा प्रस्तुत हिन्दीगजलें लम्बे समय से प्रचलित दो धारणाओं को धराशाई करती हैं, एक कि हिन्दी खुरदुरी भाषा है, जिसमें बिना उर्दू की शब्दावली के मुलायम बात कह पाना सम्भव नहीं तथा दो, कि हिन्दी की गजलों में गजलीयत (कविताई) का अभाव मिलता है और वे सपाटबयानी अधिक हैं. इनकी गजलों को पढ़ते हुए हम अनुभव करते हैं कि किस प्रकार शुद्ध हिन्दी में भी गजल कह पाना सम्भव है.
अन्य विद्वानों / विदुषियों के विचारों का भी सहर्ष स्वागत है

लाड़ली बेटी सुनो तुम

 लाड़ली बेटी सुनो तुम मात्र लैला ही नहीं हो,
तुम सुभद्रा, आम्रपाली, पद्मिनी भी हो
बस तुहिन-कण ही नहीं हो, बस झमाझम ही नहीं हो,
तुम हिमालय की सुता मन्दाकिनी भी हो 
 
द्रौपदी, तारा, अहिल्या, रुक्मिणी, मन्दोदरी या
मन्थरा, कैकेइ तक ही क्यों रहो सीमित
तुम महाकाली, भवानी, चण्डिका, दुर्गा, शिवानी,
काल की भी काल तुम  कात्यायिनी भी हो
 
तुम समय को भूलकर भी छूट इतनी दे न देना
ताकि वह भ्रमजाल बुनकर तुमको उलझा ले
दुष्ट का संहार करना किन्तु कर्कश हो न जाना
तुम स्वरों की स्रोत वीणावादिनी भी हो
 
ताल में सहगामिनी हो चाल में गजगामिनी हो
शून्य के प्रासाद की सौदामिनी, लाड़ो
काम के सेवक की हो तुम यदि सनातन-सेविका तो
कामना रूपी महल की स्वामिनी भी हो
 
वास्तविकता तो यही है हर अटल के दो पटल हैं
जो उदय होता है उस का अस्त निश्चित है
मेरी प्यारी, लाड़ली तुम भोर तो ही जगत की,
किन्तु उस के साथ में ही यामिनी भी हो

No comments:

Post a Comment