क्यों भला अवसाद में उन्माद में बहते रहो
हर घड़ी आनन्द में आल्हाद में
बहते रहो
कृष्ण को पाना है तो बहते
रहो अनुराग में
राम को पाना है तो मर्याद में बहते रहो
हो विषय कोई भी उसका छोर मिल
ही जायगा
लक्ष्य को थामे हुए सम्वाद में बहते रहो
तत्व दर्शन के लिये तो एक ये
ही मार्ग है
तत्त्वतः उस तत्व के आस्वाद में बहते रहो
ये मेरा अनुरोध है पीछा छुड़ा
लो दम्भ से
ब्रह्म मिल जायेगा अनहद नाद में बहते रहो
राम को पाना है तो मर्याद में बहते रहो
लक्ष्य को थामे हुए सम्वाद में बहते रहो
तत्त्वतः उस तत्व के आस्वाद में बहते रहो
ब्रह्म मिल जायेगा अनहद नाद में बहते रहो
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