इस कला में हम परम विश्वस्त हैं
काम तो कुछ भी नहीं पर
व्यस्त हैं
मित्र यह उपलब्धि साधारण
नहीं
त्रस्त हो कर भी अहर्निश मस्त हैं
आप सिंहासन सुशोभित कीजिये
हम पराजय के लिए आश्वस्त हैं
वे भला कैसे दिखेंगे आपको
जो उदित होते हुए भी अस्त हैं
दोष क्यों दीजै किसी को भी ‘नवीन’
हम तो लुटने के लिए अभ्यस्त हैं
त्रस्त हो कर भी अहर्निश मस्त हैं
हम पराजय के लिए आश्वस्त हैं
जो उदित होते हुए भी अस्त हैं
हम तो लुटने के लिए अभ्यस्त हैं
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