कितना भी आभासी हो लेकिन भाता ही है
पचपन पार करो तो बचपन याद
आता ही है
जब जब सावन आता है और गाती
है कोयल
मन का पंछी भी अपने पर फैलाता ही है
जब जब फागुन आता है और बजते
हैं ढप ढोल
पागल मनुआ होली का फगुआ गाता ही है
फुल पर चलता ए सी भी
सन्तुष्टि नहीं देता
पुरवइया का झोंका मन को ललचाता ही है
सुधियों की वर्षा होने पर
भावों का निर्झर
कितना भी रोको नयनों से झर जाता ही है
ज्ञात सभी को है गूलर का फूल
नहीं मिलना
फिर भी उसका मोह सभी को भरमाता ही है
मन का पंछी भी अपने पर फैलाता ही है
पागल मनुआ होली का फगुआ गाता ही है
पुरवइया का झोंका मन को ललचाता ही है
कितना भी रोको नयनों से झर जाता ही है
फिर भी उसका मोह सभी को भरमाता ही है
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