टोकने वाले टोकते ही हैं
देखने वाले देखते ही हैं
चन्द्रमा देखता ही रहता है
टूटने वाले टूटते ही हैं
बात राधा की हो कि मीरा की
चाहने वाले चाहते ही हैं
कुछ नहीं चलती सागरों की भी
लाँघने वाले लाँघते ही हैं
कृष्ण-भ्राता हों या विभीषण
हों
बोलने वाले बोलते ही हैं
आप चाहें तो मत सुनें उनको
फेंकने वाले फेंकते ही हैं
टूटने वाले टूटते ही हैं
चाहने वाले चाहते ही हैं
लाँघने वाले लाँघते ही हैं
बोलने वाले बोलते ही हैं
फेंकने वाले फेंकते ही हैं
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