परिचय - नवीन सी. चतुर्वेदी

परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी

Tuesday, 9 June 2026

अश्रुधारा ठहर न पायेगी

 अश्रुधारा ठहर न पायेगी
बाँध टूटा तो बाढ़ आयेगी
 
देख सौतन से कुछ नहीं कहियो
खींच कर ये ही पी को लायेगी 

कोई इस तथ्य को माने न माने

 कोई इस तथ्य को माने न माने
डगर दिखलायी है माता पिता ने
 
अठन्नी जैसे हैं अब आठ सौ भी
कभी पर्याप्त थे बस चार आने 

भला ये कौन सा सुख है

 भला ये कौन सा सुख है
किसी का दुख मेरा सुख है
 
ये मेरा दुख नहीं प्यारे
किसी मनमीत का सुख है 

कष्ट आया तो डर गये सारे

 कष्ट आया तो डर गये सारे
अपनी-अपनी डगर गये सारे
 
उसकी डलिया में थे खिलोने कुछ
भीड़ आयी बिखर गये सारे 

कष्ट जब भीमकाय लगता है

 कष्ट जब भीमकाय लगता है
धैर्य उत्तम उपाय लगता है
 
तुम पिलाओ तो रस करेले का
मीठी अदरक की चाय लगता है 

कहूँ किस तरह मुझको आशा नहीं है

 कहूँ किस तरह मुझको आशा नहीं है
निराशा भरी मेरी भाषा नहीं है
 
वही लक्ष्य है उसको पा के रहेंगे
भले थक गये पर हताशा नहीं है 

बात अब ये समझ में आई है

 बात  अब ये समझ में आई है
मौन रहने में ही भलाई है
 
जिसके अधरों धरी है बाँसुरिया
मैं ने उससे लगन लगाई है 

हम ना तो हैं कठपुतली ना रेस के घोड़े हैं

 हम ना तो हैं कठपुतली ना रेस के घोड़े हैं
जग मानसरोवर है हम हंसों के जोड़े हैं
 
बस तैरने में ही तुम जीवन न बिता देना
उड़ने के लिए पर भी भगवान ने जोड़े हैं 

तज के मैली मैली कोरी कोरी गागर भरती है

 तज के मैली मैली कोरी कोरी गागर भरती है
चोर नहीं है फिर भी चोरी चोरी गागर भरती है
 
ओ रसिया मोरे मन बसिया तोरा ही तो है सबकुछ
ओ परमातम तोरी आतम तोरी गागर भरती है 

टोकने वाले टोकते ही हैं

 टोकने वाले टोकते ही हैं
देखने वाले देखते ही हैं
 
चन्द्रमा देखता ही रहता है
टूटने वाले टूटते ही हैं 

सन्तों की बानी जैसा बन

 सन्तों की बानी जैसा बन
मीरा दीवानी जैसा बन
 
तोड़ के बन्धन बाहर आ जा
झरनों के पानी जैसा बन 

हाँ ये स्वीकार कर रहे हैं हम

 हाँ ये स्वीकार कर रहे हैं हम
तुम नहीं हो तो डर रहे हैं हम
 
कल कहा था कि तुम पराये हो 
आज फिर से मुकर रहे हैं हम 

जो अहोभाव से भरा होगा

 जो अहोभाव से भरा होगा
उसका मन पारिजात सा होगा
 
व्यक्तियों से लड़ेंगे कबतक हम
मानसिकता से जूझना होगा 

और सबकुछ तो पढ़ लिया उसने

 और सबकुछ तो पढ़ लिया उसने
ढाई आखर नहीं पढ़ा उसने
 
मित्र से पहले प्रिय भी बोला था
शब्द पहला नहीं सुना उसने 

मेरी काया को सहलाती रहे बस

 मेरी काया को सहलाती रहे बस
वो पुरवइया पवन आती रहे बस
 
मैं पलकों से डगर उसकी बुहारूँ
वो मुझसे काम करवाती रहे बस 

अब तो दे भी दीजिये दर्शन

 अब तो दे भी दीजिये दर्शन
पारदर्शी हो गये दरपन
 
तुमने पूछा कामना क्या है
कर दिया मैं ने हॄदय अरपन 

जब तलक ढूँढे पोर-पोर नहीं

 जब तलक ढूँढे पोर-पोर नहीं
मीत का मिलता ओर-छोर नहीं
 
एक ऐसा मनुष्य दिखला दो
उसके हाथों में जिसकी डोर नहीं 

किसलिए उपकार को उपकार बोलूँ

 किसलिए उपकार को उपकार बोलूँ
क्यों अपेक्षा की तुला पर प्रेम तोलूँ
 
एक युग से बैठा हूँ पलकें बिछाये
तुम जो आ जाओ तो मन के द्वार खोलूँ 

किसी के डग पै डग धर के तो देखो

 किसी के डग पै डग धर के तो देखो
किसी की माँग तुम भर के तो देखो
 
तुम्हें ललनाएँ जूड़ों में जड़ेंगीं
सुमन जैसे कभी झर के तो देखो 

उस अलौकिक जोत को कोई बुझा सकता नहीं

 उस अलौकिक जोत को कोई बुझा सकता नहीं
प्रेम के अस्तित्व को कोई मिटा सकता नहीं
 
एक ही अन्तस है मेरा जो तुम्हें दिखला चुका
चीर कर निज वक्ष को फिर-फिर दिखा सकता नहीं 

मीरा और गिरिधर जैसी गरिमा से छुआ करो

 मीरा और गिरिधर जैसी गरिमा से छुआ करो
मन की आशा को मन की भाषा से छुआ करो
 
जैसे स्पर्श किया कान्हा ने श्री राधे का मन
छुआ करो तो वैसी मर्यादा से छुआ करो 

दुर्गरक्षक द्वार पर दिख तो रहे हैं

 दुर्गरक्षक द्वार पर दिख तो रहे हैं
जागने का है समय पर सो रहे हैं
 
बस तुम्हारी ही कमर टूटी नहीं है
बोझ दुष्टों का तो हम भी ढो रहे हैं 

विश्व के व्यापक हितों में थे

 विश्व के व्यापक हितों में थे
हम सनातन शिक्षितों में थे
 
कल कहाँ थीं ऐसी सुविधाएं
फिर भी हम आनन्दितों में थे 

कितना भी आभासी हो लेकिन भाता ही है

 कितना भी आभासी हो लेकिन भाता ही है
पचपन पार करो तो बचपन याद आता ही है
 
जब जब सावन आता है और गाती है कोयल
मन का पंछी भी अपने पर फैलाता ही है 

ब्याज नहीं भूले केवल मूलों को भूल गये

 ब्याज नहीं भूले केवल मूलों को भूल गये
जीवन बगिया के कितने फूलों को भूल गये
 
सबसे कहते फिरते हैं सावन को मत भूलो
और स्वयं सावन वाले झूलों को भूल गये 

मान्य करता हूँ पिता बनना अहम सौभाग्य है

 मान्य करता हूँ पिता बनना अहम सौभाग्य है
किन्तु बेटी का पिता बनना परम सौभाग्य है
 
दान करना यों तो हर श्रेणी में है सौभाग्य ही
किन्तु कन्यादान करना उच्चतम सौभाग्य है 

बेसन का लड्डू रबड़ी का लच्छा बन जा रे

 बेसन का लड्डू रबड़ी का लच्छा बन जा रे
अम्मा ने बोला है फिर से बच्चा बन जा रे
 
देख ये बच्चे ढूँढ रहे हैं मोबाइल में चाँद
ऐसा कर तू चन्दा मामा इनका बन जा रे 

न तुमसे बैर करना है न झगड़ा ही बढ़ाना है

 न तुमसे बैर करना है न झगड़ा ही बढ़ाना है
कहीं से दृष्टि ले आओ तुम्हें दरपन दिखाना है
 
वे सेवक हैं अमावस के उन्हें पूनम से क्या लेना
समझते क्यों नहीं हो तुम उन्हें तुमको थकाना है 

मीत को मनाओगे तब हॄदय द्रवित होगा

 मीत को मनाओगे तब हॄदय द्रवित होगा
मन से मन मिलाओगे तब हृदय द्रवित होगा
 
जाल में किसी को जब तुम तड़पता देखोगे
और बचा न पाओगे तब हृदय द्रवित होगा 

पिरामिडों की तरह थर पै थर बनाती हुई

 पिरामिडों की तरह थर पै थर बनाती हुई
विरह की पीर शिखर पर शिखर बनाती हुई
 
मैं अपने मन में बिछुड़ने के दृश्य बुनता हुआ
वो अपने मन में अधर पर अधर बनाती हुई 

कर्म जब जब कामिनी का रूप धरता है

 कर्म जब जब कामिनी का रूप धरता है
भाग्य जीवन संगिनी का रूप धरता है
 
किस पुरुष में नारि के दर्शन नहीं होते
मेघ भी तो दामिनी का रूप धरता है 

रंग बरसाती विविधरंगी मनीषा को नमन

 रंग बरसाती विविधरंगी मनीषा को नमन
व्यक्ति का व्यक्तित्त्व विकसाती मनीषा को नमन
 
वीर माता अंजनी जैसी मनीषा को नमन
शेष माता रोहिणी जैसी मनीषा को नमन 

आत्म से अनभिज्ञ हैं अंतःकरण सिखला रहे हैं

 आत्म से अनभिज्ञ हैं अंतःकरण सिखला रहे हैं
खाट पर लेटे हुए हैं जागरण सिखला रहे हैं
 
दूध से परिचय नहीं पर शास्त्र लिख मारे दही पर
रूप तो समझे नहीं रूपान्तरण सिखला रहे हैं 

यातना सी यातना है

 यातना सी यातना है
बात करना भी मना है
 
अपनी हो या हो परायी
वेदना तो वेदना है 

छूटना है बन्धनों से

 छूटना है बन्धनों से
छूटिए आलिंगनों से
 
नाम है सन्तोष जिसका
वह मिलेगा निर्धनों से 

और भला क्या होना है

 और भला क्या होना है
वो ही रोना धोना है
 
रो कर पाया था जीवन
हँसते-हँसते खोना है 

पंक्ति बनाकर बैठे हैं

 पंक्ति बनाकर बैठे हैं
पंछी कितने प्यारे हैं
 
पुण्य नहीं,ये तो छल है
दाने जाल के नीचे हैं 

सत्य तो ब्यौहार है

 सत्य तो ब्यौहार है
झूठ आविष्कार है
 
ये कोई नदिया नहीं
प्रेम पारावार है 

जिसके मन में करुणा का संचार नहीं है प्रीत नहीं है

 जिसके मन में करुणा का संचार नहीं है प्रीत नहीं है
सबका प्यारा होगा लेकिन वह मेरा मनमीत नहीं है
 
स्वार्थ रहित संगत को ही तो सच्ची प्रीत कहा है सबने
ब्यौपारी बनकर के जीना मनमीतों की रीत नहीं है 

सच कहता हूँ मन का कोना कोना सुरभित हो जाता है

 सच कहता हूँ मन का कोना कोना सुरभित हो जाता है
तुम से मिलता हूँ तो मेरा मन आनन्दित हो जाता है
 
जो मिश्री से भी मीठी हों ऐसी बातें ही करिए बस
अच्छा हो ब्यौहार तो सबके मन पर अंकित हो जाता है 

प्राणी को प्राणी ही कहना जलचर थलचर मत कहना

 प्राणी को प्राणी ही कहना जलचर थलचर मत कहना
जिसके मन में प्रेम भरा हो उसको पत्थर मत कहना
 
निश्चित ही कंकर कंकर में शंकर बसते हैं फिर भी
जिस कण में कल्याण नहीं हो उसको शंकर मत कहना 

आप कहते हैं अल्प है साथी

 आप कहते हैं अल्प है साथी
अब सदाचार स्वल्प है साथी
 
भीड़ में हैं तो साथ चलना है
अन्यथा क्या विकल्प है साथी 

नदी के आर देखो पार देखो

 नदी के आर देखो पार देखो
समझ में आ सके तो सार देखो
 
सवा के पौन तो बजने नहीं हैं
घड़ी को तुम भले सौ बार देखो 

रसायन वाली वर्षा हो रही है

 रसायन वाली वर्षा हो रही है
परागों की परीक्षा हो रही है
 
नये फैशन में चूड़ी है उपेक्षित
नखों पर साज सज्जा हो रही है 

फैला दसों दिशाओं में जितना प्रकाश है

 फैला दसों दिशाओं में जितना प्रकाश है
हर मन में जो बसा है उसी का प्रकाश है
 
भ्रम दूर कर न पाये वो खद्योत भी नहीं
आँखों को खोल दे वो ही सच्चा प्रकाश है 

सुरम्य सुन्दर उदार नैना

 सुरम्य सुन्दर उदार नैना
परन्तु अबतक कुमार नैना
 
हम उसके रूपों को देख पाएं
सो दे रहा है उधार नैना 

दूसरा पहर नहीं विहान के समान है

 दूसरा पहर नहीं विहान के समान है
और यह विहान हर निदान के समान है
 
नगर-नगर डगर-डगर पै इसकी जोत जल रही
को’यले का मान सूर्य मान के समान है 

ना तो निर्वाण का न उद्भव का

 ना तो निर्वाण का न उद्भव का
काल तो श्रेष्ठतम है शैशव का
 
बालपन जैसे गोपियों का प्रेम
और संसार ज्ञान उद्धव का 

पुनः योग वैसे बनाने ही होंगे

 पुनः योग वैसे बनाने ही होंगे
तलैया सरोवर बचाने ही होंगे
 
जो वटवृक्ष बनकर टिकें पीढ़ियों तक
हमें ऐसे पौधे लगाने ही होंगे 

ग्रीष्म की रुत है लूह है तो है

 ग्रीष्म की रुत है लूह है तो है
अब ये जीवन दुरूह है तो है
 
इससे बाहर निकलने की सोचो
लालसा चक्रव्यूह है तो है 

सृष्टि को दृष्टि से परे मत बोल

 सृष्टि को दृष्टि से परे मत बोल
कर्म को राम आसरे मत बोल
 
गीत जो चाहे वो सुना लेकिन
अन्तरों वाले अन्तरे मत बोल 

दुराचार उन्माद है सभ्यता का

 दुराचार उन्माद है सभ्यता का
सदाचार सम्वाद है सभ्यता का
 
शहद जैसा मीठा सुमन जैसा कोमल
विनम्र आचरण स्वाद है सभ्यता का 

घर बुला कर के घात मत करना

 घर बुला कर के घात मत करना
हमसे अनबन की बात मत करना
 
मन में अनुराग को बसाना बस
द्वेष को आत्मसात मत करना 

जो है गंगा जमुन की धारों में

 जो है गंगा जमुन की धारों में
बस वही भाव हों विचारों में
 
सब कथा जानते हैं ऋतुओं की
बुद्धि कितनी है देवदारों में 

सोच समझ कर डग धरना ही श्रेयस्कर है

 सोच समझ कर डग धरना ही श्रेयस्कर है
ऊपर वाले से डरना ही श्रेयस्कर है
 
लक्ष्मी आयी है तो नहाने क्यों जायें हम
आगत का स्वागत करना ही श्रेयस्कर है 

मुँह में मिश्री घोलने वाली बोली में कब लिक्खोगे

 मुँह में मिश्री घोलने वाली बोली में कब लिक्खोगे
हिन्दी के गुण गाने वालो हिन्दी में कब लिक्खोगे
 
यद्यपि हर शैली अच्छी है तद्यपि वाणी के प्यारो
शैलों को भी पिघला दे उस शैली में कब लिक्खोगे 

धवल मुखचन्द्र पर जब श्याम कुन्तल नृत्य करते हैं

 धवल मुखचन्द्र पर जब श्याम कुन्तल नृत्य करते हैं
तो यों लगता है ज्यों लहरा के बादल नृत्य करते हैं
 
सभा सावन सजाये और पावस हो पखावज पर
गगन कहता है तत् तत् थेइ जल थल नृत्य करते हैं 

क्यों भला अवसाद में उन्माद में बहते रहो

 क्यों भला अवसाद में उन्माद में बहते रहो
हर घड़ी आनन्द में आल्हाद में बहते रहो
 
कृष्ण को पाना है तो बहते रहो अनुराग में
राम को पाना है तो मर्याद में बहते रहो 

मृगतृष्णा ने ऐसा जाल बिछाया था

 मृगतृष्णा ने ऐसा जाल बिछाया था
मरुथल यमुना गंगा जैसा लगता था
 
रावण और मारीच तो दुय्यम कारण थे
पहला कारण मृगछाला का सपना था 

ओढ़कर धानी चुनर हिन्दी गजल

 ओढ़कर धानी चुनर हिन्दी गजल
बढ़ रही सन्मार्ग पर हिन्दी गजल
 
विश्वकविता ने चुना जिस पन्थ को
है उसी पर अग्रसर हिन्दी गजल 

परम दयालु हैं कृपानिधान हैं गणेश जी

 परम दयालु हैं कृपानिधान हैं गणेश जी
अनन्य अप्रतिम गुणों की खान हैं गणेश जी
 
तिमिर में ज्योति पुंज के समान हैं गणेश जी
प्रचण्ड रात्रि हेतु अंशुमान हैं गणेश जी 

देवि, हंसासीन, वीणा-वादिनी माँ शारदे

 देवि, हंसासीन, वीणा-वादिनी माँ शारदे
वागदेवी, भारती, वर-दायिनी माँ शारदे
 
श्वेत पद्मासन विराजित, वैष्णवी माँ- शारदे
हे प्रजापत्यात्मजा, शतरूपिणी माँ शारदे 

अगर अमरित गटकना हो तो कतराते हैं माहेश्वर

 अगर अमरित गटकना हो तो कतराते हैं माहेश्वर
मगर विषपान करना हो तो आ जाते हैं माहेश्वर
 
कभी सरयू किनारे तो कभी गोकुल की गलियों में
कभी राघव कभी कान्हा को दुलराते हैं माहेश्वर 

निरन्तर सद्गुणों का उन्नयन करते हुए रघुवर

 निरन्तर सद्गुणों का उन्नयन करते हुए रघुवर
यती बन कर जिये पल-पल जतन करते हुए रघुवर
 
सदा ही सज्जनों से संगमन करते हुए रघुवर
प्रजा के प्रिय बने जीवन, हवन करते हुए रघुवर 

भय से ग्रस्त नहीं हैं लेकिन कब तक पीर छुपायें कान्हा

 भय से ग्रस्त नहीं हैं लेकिन कब तक पीर छुपायें कान्हा
तुम्हीं कहो ऐसे ही कबतक स्वयं को ही भरमायें कान्हा
 
पल-पल बढ़ती जनसंख्या ने कण-कण में विष भर डाला है
कालीदह जैसे सिस्टम से कैसे पिण्ड छुड़ायें कान्हा 

हॄदय को सर्वप्रथम निर्विकार करना था

 हॄदय को सर्वप्रथम निर्विकार करना था
तदोपरान्त विषय पर विचार करना था
 
कदापि ध्यान में थी ही नहीं दशा उसकी
नदी में हमको तो बस जलविहार करना था 

व्यर्थ साधो बन रहे हो, कामना तो कर चुके हो

 व्यर्थ साधो बन रहे हो, कामना तो कर चुके हो
उर्वशी से प्रेम की तुम याचना तो कर चुके हो
 
पंच तत्वों से विनिर्मित जग नियम ही से चलेगा
वर्जना के हेतु समझो गर्जना तो कर चुके हो 

हे शुभांगी कोमलांगों का प्रदर्शन मत करो

 हे शुभांगी कोमलांगों का प्रदर्शन मत करो
ये ही सब करना है तो संस्कार-वाचन मत करो
 
सृष्टि के आरम्भ ही से तुम सहज स्वाधीन थीं
क्यों हुईं परवश, विचारो, मात्र रोदन मत करो 

न तो उपकार की ना ही दया की दृष्टि से देखें

 न तो उपकार की ना ही दया की दृष्टि से देखें
सभा की सुष्मिता को सभ्यता की दृष्टि से देखें
 
कलेवर में कलेवर को ही बस देखा तो क्या देखा
कला को देखना है तो कला की दृष्टि से देखें 

राजनीति का प्रहसन क्या विचित्र प्रहसन है

 राजनीति का प्रहसन क्या विचित्र प्रहसन है
कल तलक जो वर्जित थे आज उनका वन्दन है
 
किस पै टिप्पणी करिए हर किसी के मस्तक पर
भिन्न-भिन्न हो कर भी एक जैसा चन्दन है 

ज्यों ही मेल-मिलाप समझ आने लगते हैं

 ज्यों ही मेल-मिलाप समझ आने लगते हैं
सभी मरम चुपचाप समझ आने लगते हैं
 
कौओं के कुल में जब कुहू-कुहू होती है
सारे क्रिया-कलाप समझ आने लगते हैं 

जब-जब जंगल के मंगल पर कण्टक आते हैं

 जब-जब जंगल के मंगल पर कण्टक आते हैं
विश्वामित्र व्यवस्थाओं पर प्रश्न उठाते हैं
 
सहसभुजी जब-जब जनधन हर कर ले जाते हैं
भृगुवंशी जैसे योद्धा कर्तव्य निभाते हैं 

जहाँ सम्वेदना सम्भव नहीं है

 जहाँ सम्वेदना सम्भव नहीं है
वहाँ सम्भावना सम्भव नहीं है
 
नियति की वर्जना सम्भव नहीं है
जड़ों को त्यागना सम्भव नहीं है 

गुणवान का सम्मान करने में भला क्या हानि थी

 गुणवान का सम्मान करने में भला क्या हानि थी
विद्वान का सम्मान करने में भला क्या हानि थी
 
कुछ व्यक्ति ऐसे भी हुए जो सूर्य के भी शत्रु थे
दिनमान का सम्मान करने में भला क्या हानि थी 

प्रतिम्मूषक को गज-आनन्द का मूषक कहें कैसे

 प्रतिम्मूषक को गज-आनन्द का मूषक कहें कैसे
जो अन्तर कम न कर पाये उसे धावक कहें कैसे
 
जो नौकायन तो सिखलाये, तरण करना न सिखलाये
उसे तारक तो कह सकते हैं उद्धारक कहें कैसे 

कर्मवीरों के प्रयासों को डिगा सकते नहीं

 कर्मवीरों के प्रयासों को डिगा सकते नहीं
शब्द-सन्धानी पहाड़ों को हिला सकते नहीं
 
अस्मिता का अर्थ बस उपलब्धि हो जिनके लिए
इस तरह के झुण्ड निज-गौरव बचा सकते नहीं 

इस कला में हम परम विश्वस्त हैं

 इस कला में हम परम विश्वस्त हैं
काम तो कुछ भी नहीं पर व्यस्त हैं
 
मित्र यह उपलब्धि साधारण नहीं
त्रस्त हो कर भी अहर्निश मस्त हैं 

मान्यवर का प्रश्न है दिनरात का आधार क्या है

 मान्यवर का प्रश्न है दिनरात का आधार क्या है
और ये दिनरात हैं इस बात का आधार क्या है
 
एक और अद्भुत अनोखा प्रश्न है श्रीमान जी का
ज्ञात का आधार क्या अज्ञात का आधार क्या है 

आकलन की बात थी सो मौन रहना ही उचित था

 आकलन की बात थी सो मौन रहना ही उचित था
अध्ययन की बात थी सो मौन रहना ही उचित था
 
तीन डग में विष्णु ने तीनों भुवन को नाप डाला
आयतन की बात थी सो मौन रहना ही उचित था 

परिस्थितियों का अनुगामी जगत अनुमान जैसा है

 परिस्थितियों का अनुगामी जगत अनुमान जैसा है
यही माता-पिता है और यही सन्तान जैसा है
 
चिता पर हो पिता और पुत्र सिर को चोट पहुँचाये
ये ऐसा कृत्य है जो उच्चतम सम्मान जैसा है 

अनन्य शब्द-शब्द में सुगन्ध का प्रपात है

 अनन्य शब्द-शब्द में सुगन्ध का प्रपात है
सदा-प्रफुल्ल आपका स्वभाव पारिजात है
 
अनेक राजहंस यदि खड़े हुए हैं पंक्ति में ?
ये तो मराल-नन्दिनी प्रसन्नता की बात है 

प्रेम सरिता में उतर कर डूब कर अनुराग में

 प्रेम सरिता में उतर कर डूब कर अनुराग में
आइये कुछ रत्न जड़ लें प्रेरणा की पाग में
 
बावरे मन! रुक तनिक, साँसों की सरगम पर थिरक
छुट न जाये हाथ से सौभाग्य भागमभाग में 

रास में रमना है बस, रस में रमण करते नहीं

 रास में रमना है बस, रस में रमण करते नहीं
जो बना करते हैं वैसा आचरण करते नहीं
 
उसके वाक्यों का निरन्तर करते हैं उल्लेख, पर
बुद्ध के बन्धुत्व से शिक्षा ग्रहण करते नहीं 

रुष्ट क्यों हैं, आपको सूचित किया तो था

 रुष्ट क्यों हैं, आपको सूचित किया तो था
ध्येय को, मन्तव्य को ज्ञापित किया तो था
 
क्या पता पुरवाई या पछुआ निगल गयी
इन्द्र ने मेघों को निर्वासित किया तो था