स्वयं समर्पित होकर विस्मय पैदा करती है
शक्ति स्वयं को शिव शंकर पर
वारा करती है
नित्य नवीन प्रथाओं को
अपनाया करती है
सजा भुगत कर भी संसार सजाया करती है
सावित्री अपनी निधि से अनजान
नहीं फिर भी
श्री होकर भी यम से भिक्षा माँगा करती है
हहा!
हहा! प्रारब्ध!! कि वैदेही जैसी नारी
राघव को लव-कुश दे कर खो जाया करती है
लोक-विरुद्ध हो उस का चण्डी बनना बस तब ही
गांधारी आँखों पर पट्टी बाँधा करती है
भारी मन से कहना पड़े तो भी
सच ही कहना
सच्ची बात हमारे मन को हलका करती है
सजा भुगत कर भी संसार सजाया करती है
श्री होकर भी यम से भिक्षा माँगा करती है
राघव को लव-कुश दे कर खो जाया करती है
गांधारी आँखों पर पट्टी बाँधा करती है
सच्ची बात हमारे मन को हलका करती है
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