किसलिए उपकार को उपकार बोलूँ
क्यों अपेक्षा की तुला पर
प्रेम तोलूँ
एक युग से बैठा हूँ पलकें
बिछाये
तुम जो आ जाओ तो मन के द्वार खोलूँ
स्वप्न जो देखा है बस इतना
सा है वह
कर लिए कर में तुम्हारे संग डोलूँ
जो अमर कर देता है दो
प्रेमियों को
पात्र मिल जाये तो उस अमृत को घोलूँ
वह जिसे कहते हैं निद्रा है
कहाँ वह
मिल सके तो मैं भी पल दो पल को सो लूँ
हूँ मनुज, अपराध
मुझसे भी हुए हैं
आप गंगा बन सकें तो पाप धो लूँ
तुम जो आ जाओ तो मन के द्वार खोलूँ
कर लिए कर में तुम्हारे संग डोलूँ
पात्र मिल जाये तो उस अमृत को घोलूँ
मिल सके तो मैं भी पल दो पल को सो लूँ
आप गंगा बन सकें तो पाप धो लूँ
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