परिचय - नवीन सी. चतुर्वेदी

परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी

वह हॄदय अपना मुझे दे तो गया है

 वह हॄदय अपना मुझे दे तो गया है
पर स्वयं अन्यत्र जा कर खो गया है
 
सूई उसके पोरों में थोड़े चुभेगी
वह तो बस रेशम का धागा पो गया है 
 
देखता भी है चुराता भी हैं आँखें
राम ही जाने उसे क्या हो गया है
 
यह अँधेरी रैन क्या ऐसे पसरती
क्या करूँ मैं चन्द्रमा ही सो गया है
 
मैं ने थोड़े ही उगाये हैं ये सपने
वह छली छल से छटाएं बो गया है
 
साथ इक दूजे के हम अब भी हैं लेकिन
प्रेम का जो भाव था वह खो गया है

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