अब तो दे भी दीजिये दर्शन
पारदर्शी हो गये दरपन
तुमने पूछा कामना क्या है
कर दिया मैं ने हॄदय अरपन
देख लो तुम पंछियों के नीड़
मुक्त को भी चाहिए बन्धन
प्रेम कान्हा की मुरलिया है
या किसी मीरा का पागलपन
प्रेम सीता का समर्पण है
या किसी शबरी की है जूठन
भाल पर नक्षत्र चमकेंगे
मन की पीड़ा को बना चन्दन
स्वर्ग जा कर क्या करेंगे हम
ना वहाँ राधा न ही मोहन
कर दिया मैं ने हॄदय अरपन
मुक्त को भी चाहिए बन्धन
या किसी मीरा का पागलपन
या किसी शबरी की है जूठन
मन की पीड़ा को बना चन्दन
ना वहाँ राधा न ही मोहन
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