कुन्द कलिका सदृश दीपमाला सदृश
भोर का सुख लगे है बिपाशा
सदृश
कोमलांगी तुम्हारे मधु-स्पर्श
से
यह हॄदय उड़ रहा है पताका सदृश
काम-क्रीड़ाएँ
उद्यान की भाँति है
तुम सुमन मेरा जीवन है शाखा सदृश
शीश पर आप हैं तो अकारण नहीं
मैं हूँ शंकर तो हैं आप गंगा सदृश
भाव में भर के देखूँ तो लगता
है यों
मैं कन्हैया सदृश तुम हो राधा सदृश
यह हॄदय उड़ रहा है पताका सदृश
तुम सुमन मेरा जीवन है शाखा सदृश
मैं हूँ शंकर तो हैं आप गंगा सदृश
मैं कन्हैया सदृश तुम हो राधा सदृश
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