जिस भ्रमर को ज्ञात है किस वाटिका में गन्ध है
उसके ही प्रारब्ध में
माधुर्य है मकरन्द है
रत्नगर्भा इस धरा पर नेष्ट
तो कुछ भी नहीं
श्रेष्ठ लेकिन वो है जिसके चित्त में आनन्द है
तीर्थयात्रा के बहाने युद्ध
से छिटके विदुर
द्वन्द में पड़ता नहीं जो बस वही निर्द्वन्द है
अन्य तत्वों से बँधी है फिर
भी बहती है पवन
छन्द पर है ध्यान जिसका बस वही स्वच्छन्द है
रण विजय करने से कोई वीर बन
जाता नहीं
सूरमा तो है वही बस जो नहीं जयचन्द है
हैं अनेकानेक बन्धन पर हमें
चिन्ता नहीं
कल भी परमानन्द था और अब भी परमानन्द है
श्रेष्ठ लेकिन वो है जिसके चित्त में आनन्द है
द्वन्द में पड़ता नहीं जो बस वही निर्द्वन्द है
छन्द पर है ध्यान जिसका बस वही स्वच्छन्द है
सूरमा तो है वही बस जो नहीं जयचन्द है
कल भी परमानन्द था और अब भी परमानन्द है
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