मेरे जैसे अकिंचन तम को भी उत्तम समझते हैं
अँधेरी रात को परभात का
उद्गम समझते हैं
“कोई दुनिया को क्या समझेगा जैसा हम समझते हैं”
जहाँ धाराएं मिलती हैं उसे संगम समझते हैं
कन्हैया के बिना हर रथ को हम टमटम समझते हैं
बहुत से लोग शिव को बस डमड्डमडम समझते हैं
कभी जो थी वितस्ता अब उसे झेलम समझते हैं
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