परिचय - नवीन सी. चतुर्वेदी

परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी

मेरे जैसे अकिंचन तम को भी उत्तम समझते हैं

मेरे जैसे अकिंचन तम को भी उत्तम समझते हैं
अँधेरी रात को परभात का उद्गम समझते हैं 

 “कोई दुनिया को क्या समझेगा जैसा हम समझते हैं”
जो ऐसी बात कहते हैं बहुत ही कम समझते हैं 

 भरतवंशी हैं हम प्यारे इसी कारण तो हम सारे
जहाँ धाराएं मिलती हैं उसे संगम समझते हैं 

भले आरूढ़ हो अर्जुन भले कुरुक्षेत्र का रण हो
कन्हैया के बिना हर रथ को हम टमटम समझते हैं
 
न उनका त्याग से परिचय न उनको भस्म का संज्ञान
बहुत से लोग शिव को बस डमड्डमडम समझते हैं
 
जगत का मूल परिवर्तन बदलता ही रहेगा यह
कभी जो थी वितस्ता अब उसे झेलम समझते हैं

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