जिस दिन से करुणा का आँचल थामा है
मत पूछो क्या खेल समय ने
खेला है
उनसे भूल नहीं हो सकती
किंचित भी
भूल तो वो करता है जो कुछ करता है
आया है जो कष्ट उसे स्वीकार
करो
आगत का स्वागत करना ही अच्छा है
बलशाली का वन्दन कौन नहीं
करता
निर्बल का वन्दन करना मानवता है
उद्गम का गन्तव्य स्वयं
उद्गम पाया
सागर का जल सागर में मिल जाता है
भेद है विष पीने, विषपायी होने में
झुकता है वो ही शंकर कहलाता है
भूल तो वो करता है जो कुछ करता है
आगत का स्वागत करना ही अच्छा है
निर्बल का वन्दन करना मानवता है
सागर का जल सागर में मिल जाता है
झुकता है वो ही शंकर कहलाता है
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