कोई इस तथ्य को माने न माने
डगर दिखलायी है माता पिता ने
अठन्नी जैसे हैं अब आठ सौ भी
कभी पर्याप्त थे बस चार आने
बड़ी शालीनता से मिल रहे हैं
कभी अपने थे पर अब हैं बिराने
व्यथा निर्जन वनों सी हो गयी
है
कहाँ से क्या निकल आये न जाने
पते में मात्र अन्तर है
क्रमों का
वही गलियाँ हैं वे ही हैं ठिकाने
कलाकारी सभाओं ने सिखाई
सदाशयता सिखाई है कला ने
कभी पर्याप्त थे बस चार आने
कभी अपने थे पर अब हैं बिराने
कहाँ से क्या निकल आये न जाने
वही गलियाँ हैं वे ही हैं ठिकाने
सदाशयता सिखाई है कला ने
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