जब तलक ढूँढे पोर-पोर नहीं
मीत का मिलता ओर-छोर नहीं
एक ऐसा मनुष्य दिखला दो
उसके हाथों में जिसकी डोर नहीं
इक न इक दिन वो मिल ही
जायेगा
भाव कोमल रखो कठोर नहीं
उसके जैसा कोई नहीं देखा
चित चुराता है फिर भी चोर नहीं
डूब सर्वांग रस के सागर में
मात्र तू उँगलियों को बोर नहीं
चन्द्र ही चन्द्र हर भवन में
हैं
उस गली में कोई चकोर नहीं
उसके हाथों में जिसकी डोर नहीं
भाव कोमल रखो कठोर नहीं
चित चुराता है फिर भी चोर नहीं
मात्र तू उँगलियों को बोर नहीं
उस गली में कोई चकोर नहीं
No comments:
Post a Comment