जब-जब जंगल के मंगल पर कण्टक
आते हैं
विश्वामित्र व्यवस्थाओं पर
प्रश्न उठाते हैं
सहसभुजी जब-जब जनधन हर कर ले जाते हैं
भृगुवंशी जैसे योद्धा कर्तव्य निभाते हैं
जब-जब
सत्ता धृतराष्ट्रों की दासी बनती है
तब-तब शर-शय्या पर भीष्म लिटाये जाते हैं
शाकुंतल-दुष्यन्त किसी इक युग के युगल नहीं
ऐसे प्रेम-प्रसंग हरिक युग में मिल जाते हैं
मेधा जात और पात से भी
श्रेयस्कर होती है
सत्यवती-सुत व्यास हमेशा पूजे जाते हैं
आयुर्वेद समान ‘नवीन’ प्रयास
किये जाओ
भारद्वाजी-सूत्र युयुत्सु-चरक सुलझाते हैं
भृगुवंशी जैसे योद्धा कर्तव्य निभाते हैं
तब-तब शर-शय्या पर भीष्म लिटाये जाते हैं
ऐसे प्रेम-प्रसंग हरिक युग में मिल जाते हैं
सत्यवती-सुत व्यास हमेशा पूजे जाते हैं
भारद्वाजी-सूत्र युयुत्सु-चरक सुलझाते हैं
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