परिचय - नवीन सी. चतुर्वेदी

परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी

Tuesday, 9 June 2026

अश्रुधारा ठहर न पायेगी

 अश्रुधारा ठहर न पायेगी
बाँध टूटा तो बाढ़ आयेगी
 
देख सौतन से कुछ नहीं कहियो
खींच कर ये ही पी को लायेगी 

कोई इस तथ्य को माने न माने

 कोई इस तथ्य को माने न माने
डगर दिखलायी है माता पिता ने
 
अठन्नी जैसे हैं अब आठ सौ भी
कभी पर्याप्त थे बस चार आने 

भला ये कौन सा सुख है

 भला ये कौन सा सुख है
किसी का दुख मेरा सुख है
 
ये मेरा दुख नहीं प्यारे
किसी मनमीत का सुख है 

कष्ट आया तो डर गये सारे

 कष्ट आया तो डर गये सारे
अपनी-अपनी डगर गये सारे
 
उसकी डलिया में थे खिलोने कुछ
भीड़ आयी बिखर गये सारे 

कष्ट जब भीमकाय लगता है

 कष्ट जब भीमकाय लगता है
धैर्य उत्तम उपाय लगता है
 
तुम पिलाओ तो रस करेले का
मीठी अदरक की चाय लगता है 

कहूँ किस तरह मुझको आशा नहीं है

 कहूँ किस तरह मुझको आशा नहीं है
निराशा भरी मेरी भाषा नहीं है
 
वही लक्ष्य है उसको पा के रहेंगे
भले थक गये पर हताशा नहीं है 

बात अब ये समझ में आई है

 बात  अब ये समझ में आई है
मौन रहने में ही भलाई है
 
जिसके अधरों धरी है बाँसुरिया
मैं ने उससे लगन लगाई है 

हम ना तो हैं कठपुतली ना रेस के घोड़े हैं

 हम ना तो हैं कठपुतली ना रेस के घोड़े हैं
जग मानसरोवर है हम हंसों के जोड़े हैं
 
बस तैरने में ही तुम जीवन न बिता देना
उड़ने के लिए पर भी भगवान ने जोड़े हैं 

तज के मैली मैली कोरी कोरी गागर भरती है

 तज के मैली मैली कोरी कोरी गागर भरती है
चोर नहीं है फिर भी चोरी चोरी गागर भरती है
 
ओ रसिया मोरे मन बसिया तोरा ही तो है सबकुछ
ओ परमातम तोरी आतम तोरी गागर भरती है 

टोकने वाले टोकते ही हैं

 टोकने वाले टोकते ही हैं
देखने वाले देखते ही हैं
 
चन्द्रमा देखता ही रहता है
टूटने वाले टूटते ही हैं 

सन्तों की बानी जैसा बन

 सन्तों की बानी जैसा बन
मीरा दीवानी जैसा बन
 
तोड़ के बन्धन बाहर आ जा
झरनों के पानी जैसा बन 

हाँ ये स्वीकार कर रहे हैं हम

 हाँ ये स्वीकार कर रहे हैं हम
तुम नहीं हो तो डर रहे हैं हम
 
कल कहा था कि तुम पराये हो 
आज फिर से मुकर रहे हैं हम 

जो अहोभाव से भरा होगा

 जो अहोभाव से भरा होगा
उसका मन पारिजात सा होगा
 
व्यक्तियों से लड़ेंगे कबतक हम
मानसिकता से जूझना होगा 

और सबकुछ तो पढ़ लिया उसने

 और सबकुछ तो पढ़ लिया उसने
ढाई आखर नहीं पढ़ा उसने
 
मित्र से पहले प्रिय भी बोला था
शब्द पहला नहीं सुना उसने 

मेरी काया को सहलाती रहे बस

 मेरी काया को सहलाती रहे बस
वो पुरवइया पवन आती रहे बस
 
मैं पलकों से डगर उसकी बुहारूँ
वो मुझसे काम करवाती रहे बस 

अब तो दे भी दीजिये दर्शन

 अब तो दे भी दीजिये दर्शन
पारदर्शी हो गये दरपन
 
तुमने पूछा कामना क्या है
कर दिया मैं ने हॄदय अरपन 

जब तलक ढूँढे पोर-पोर नहीं

 जब तलक ढूँढे पोर-पोर नहीं
मीत का मिलता ओर-छोर नहीं
 
एक ऐसा मनुष्य दिखला दो
उसके हाथों में जिसकी डोर नहीं 

किसलिए उपकार को उपकार बोलूँ

 किसलिए उपकार को उपकार बोलूँ
क्यों अपेक्षा की तुला पर प्रेम तोलूँ
 
एक युग से बैठा हूँ पलकें बिछाये
तुम जो आ जाओ तो मन के द्वार खोलूँ 

किसी के डग पै डग धर के तो देखो

 किसी के डग पै डग धर के तो देखो
किसी की माँग तुम भर के तो देखो
 
तुम्हें ललनाएँ जूड़ों में जड़ेंगीं
सुमन जैसे कभी झर के तो देखो 

उस अलौकिक जोत को कोई बुझा सकता नहीं

 उस अलौकिक जोत को कोई बुझा सकता नहीं
प्रेम के अस्तित्व को कोई मिटा सकता नहीं
 
एक ही अन्तस है मेरा जो तुम्हें दिखला चुका
चीर कर निज वक्ष को फिर-फिर दिखा सकता नहीं 

मीरा और गिरिधर जैसी गरिमा से छुआ करो

 मीरा और गिरिधर जैसी गरिमा से छुआ करो
मन की आशा को मन की भाषा से छुआ करो
 
जैसे स्पर्श किया कान्हा ने श्री राधे का मन
छुआ करो तो वैसी मर्यादा से छुआ करो 

दुर्गरक्षक द्वार पर दिख तो रहे हैं

 दुर्गरक्षक द्वार पर दिख तो रहे हैं
जागने का है समय पर सो रहे हैं
 
बस तुम्हारी ही कमर टूटी नहीं है
बोझ दुष्टों का तो हम भी ढो रहे हैं 

विश्व के व्यापक हितों में थे

 विश्व के व्यापक हितों में थे
हम सनातन शिक्षितों में थे
 
कल कहाँ थीं ऐसी सुविधाएं
फिर भी हम आनन्दितों में थे 

कितना भी आभासी हो लेकिन भाता ही है

 कितना भी आभासी हो लेकिन भाता ही है
पचपन पार करो तो बचपन याद आता ही है
 
जब जब सावन आता है और गाती है कोयल
मन का पंछी भी अपने पर फैलाता ही है 

ब्याज नहीं भूले केवल मूलों को भूल गये

 ब्याज नहीं भूले केवल मूलों को भूल गये
जीवन बगिया के कितने फूलों को भूल गये
 
सबसे कहते फिरते हैं सावन को मत भूलो
और स्वयं सावन वाले झूलों को भूल गये