परिचय - नवीन सी. चतुर्वेदी

परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी

प्रीत में हर बात को विपरीत कहते हैं सखी

 प्रीत में हर बात को विपरीत कहते हैं सखी
मन चुराता है उसे मनमीत कहते हैं सखी
 
रुक्मिणी से पूछ ले या राधिका से पूछ लो
प्रीत में तो हार को ही जीत कहते हैं सखी 

नयनों में जिसने भर लिया करुणा, क्षमा के रूप को

 नयनों में जिसने भर लिया करुणा, क्षमा के रूप को
वो ही समझ सकता है केवल उर्मिला के रूप को
 
है दृष्टि सबके पास लेकिन श्रेष्ठ दृष्टा है वही
आकाश बनकर देखता है जो धरा के रूप को 

जब भी उसको देखिए बिन बात भी रोता बहुत है

 जब भी उसको देखिए बिन बात भी रोता बहुत है
कोई माने या न माने  किन्तु वो शाणा बहुत है
 
यह चटोरी जीभ ही भरमा रही है हर किसी को
पेट भरने के लिए तो पाव भर आटा बहुत है 

जिस भ्रमर को ज्ञात है किस वाटिका में गन्ध है

 जिस भ्रमर को ज्ञात है किस वाटिका में गन्ध है
उसके ही प्रारब्ध में माधुर्य है मकरन्द है
 
रत्नगर्भा इस धरा पर नेष्ट तो कुछ भी नहीं
श्रेष्ठ लेकिन वो है जिसके चित्त में आनन्द है 

प्रीत की प्रतीत को पुनीत मानते नहीं

 प्रीत की प्रतीत को पुनीत मानते नहीं
जिनको पूजते हैं उनकी रीत मानते नहीं
 
गीत उनके गा रहे जो छोड़कर चले गये
संग रह रहे हैं उनको मीत मानते नहीं 

आप जबतक हाथों में लेकर गुलाल आते नहीं

 आप जबतक हाथों में लेकर गुलाल आते नहीं
आम के पेड़ों पै भी मीठे रसाल आते नहीं
 
आपसे अनुराग है तो है छुपाएं किसलिए
हम भले मानुस हैं हमको झोलझाल आते नहीं 

मेरे जैसे अकिंचन तम को भी उत्तम समझते हैं

मेरे जैसे अकिंचन तम को भी उत्तम समझते हैं
अँधेरी रात को परभात का उद्गम समझते हैं 

 “कोई दुनिया को क्या समझेगा जैसा हम समझते हैं”
जो ऐसी बात कहते हैं बहुत ही कम समझते हैं 

मीरा और गिरिधर जैसी गरिमा से छुआ करो

 मीरा और गिरिधर जैसी गरिमा से छुआ करो
मन की आशा को मन की भाषा से छुआ करो
 
जैसे स्पर्श किया कान्हा ने श्री राधे का मन
छुआ करो तो वैसी मर्यादा से छुआ करो 

और कोई पल तो केवल काल की हलचल लगे

 और कोई पल तो केवल काल की हलचल लगे
जिसमें हो अस्तित्व तेरा बस वही पल, पल लगे
 
मातृ ममता को लुटाते, गुदगुदाते करकमल
इतना मीठा स्पर्श हरसिंगार सा कोमल लगे 

प्राण तो आप हैं मात्र काया हूँ मैं

 प्राण तो आप हैं मात्र काया हूँ मैं
तात श्री आप ही की तो छाया हूँ मैं
 
ये तनिक सा कदाचित जो छाया हूँ मैं
आपके आशिषों में समाया हूँ मैं 

नवल चन्द्रमा की धवल चन्द्रिका हो

 नवल चन्द्रमा की धवल चन्द्रिका हो
हॄदय-स्वामिनी तुम खुली पुस्तिका हो
 
जिसे पा लिया हो गयीं बस उसी की
तुम इस विश्व की श्रेष्ठतम प्रेमिका हो 

लाड़ली बेटी सुनो तुम

 लाड़ली बेटी सुनो तुम मात्र लैला ही नहीं हो,
तुम सुभद्रा, आम्रपाली, पद्मिनी भी हो
बस तुहिन-कण ही नहीं हो, बस झमाझम ही नहीं हो,
तुम हिमालय की सुता मन्दाकिनी भी हो 

मात्र इतनी सी हमारी कामना है

 मात्र इतनी सी हमारी कामना है
जो नहीं पाया है उसको बाँटना है
 
वेदना तो दिख रही है हर हृदय में
बस हमें सम्वेदना को खोजना है 

इस निशा का विहान भी होगा

 इस निशा का विहान भी होगा
रोग है तो निदान भी होगा
 
कष्ट आया है तो डरें क्योंकर
कुछ न कुछ प्रावधान भी होगा 

पीड़ा को सह कर देखोगे तो समझोगे

 पीड़ा को सह कर देखोगे तो समझोगे
ज्वाला में दह कर देखोगे तो समझोगे
 
मिट्टी का मिट्टी में मिलना क्या होता है
परबत बन ढह कर देखोगे तो समझोगे 

कौन सी उर्दू गजल है कौन सी हिन्दीगजल

 कौन सी उर्दू गजल है कौन सी हिन्दीगजल
पूछने पर बुद्धि बोली यह कँवल है वह कमल
 
एक तो नुक़्ते का अन्तर दूसरा उच्चार का
नक्ल है जो रेखता में, हिन्दवी में है नकल 

भले गंगा के या जमुना के तीरे

 भले गंगा के या जमुना के तीरे
चदरिया बुनने फिर आ जा कबीरे
 
पवन के पुत्र की फिर से परीक्षा
वो अपना वक्ष कितनी बार चीरे 

किसी भी हाल में खोना नहीं है

 किसी भी हाल में खोना नहीं है
ये सच्चा प्रेम है सोना नहीं है
 
हॄदय बोला दुखी अब और मत कर
नयन भी बोल उठे रोना नहीं है 

शबरी जैसों ने जिनको मीठा समझा है

 शबरी जैसों ने जिनको मीठा समझा है
रघुवर जैसों ने उनको ही आरोगा है
 
मैं शबरी जैसों के आश्रम की चींटी हूँ
मैं ने जूठन की जूठन का स्वाद लिया है 

जिस दिन से करुणा का आँचल थामा है

 जिस दिन से करुणा का आँचल थामा है
मत पूछो क्या खेल समय ने खेला है
 
उनसे भूल नहीं हो सकती किंचित भी
भूल तो वो करता है जो कुछ करता है 

वह हॄदय अपना मुझे दे तो गया है

 वह हॄदय अपना मुझे दे तो गया है
पर स्वयं अन्यत्र जा कर खो गया है
 
सूई उसके पोरों में थोड़े चुभेगी
वह तो बस रेशम का धागा पो गया है 

क्षितिज की भाँति वह भी कल्पना ही है

 क्षितिज की भाँति वह भी कल्पना ही है
हमें तो फिर भी उसको खोजना ही है
 
भले रतिया बिता आना पर आ जाना
हमारा क्या हमें तो जागना ही है 

अश्रुधारा ठहर न पायेगी

 अश्रुधारा ठहर न पायेगी
बाँध टूटा तो बाढ़ आयेगी
 
देख सौतन से कुछ नहीं कहियो
खींच कर ये ही पी को लायेगी 

कोई इस तथ्य को माने न माने

 कोई इस तथ्य को माने न माने
डगर दिखलायी है माता पिता ने
 
अठन्नी जैसे हैं अब आठ सौ भी
कभी पर्याप्त थे बस चार आने 

भला ये कौन सा सुख है

 भला ये कौन सा सुख है
किसी का दुख मेरा सुख है
 
ये मेरा दुख नहीं प्यारे
किसी मनमीत का सुख है 

कष्ट आया तो डर गये सारे

 कष्ट आया तो डर गये सारे
अपनी-अपनी डगर गये सारे
 
उसकी डलिया में थे खिलोने कुछ
भीड़ आयी बिखर गये सारे 

कष्ट जब भीमकाय लगता है

 कष्ट जब भीमकाय लगता है
धैर्य उत्तम उपाय लगता है
 
तुम पिलाओ तो रस करेले का
मीठी अदरक की चाय लगता है 

कहूँ किस तरह मुझको आशा नहीं है

 कहूँ किस तरह मुझको आशा नहीं है
निराशा भरी मेरी भाषा नहीं है
 
वही लक्ष्य है उसको पा के रहेंगे
भले थक गये पर हताशा नहीं है 

बात अब ये समझ में आई है

 बात  अब ये समझ में आई है
मौन रहने में ही भलाई है
 
जिसके अधरों धरी है बाँसुरिया
मैं ने उससे लगन लगाई है 

हम ना तो हैं कठपुतली ना रेस के घोड़े हैं

 हम ना तो हैं कठपुतली ना रेस के घोड़े हैं
जग मानसरोवर है हम हंसों के जोड़े हैं
 
बस तैरने में ही तुम जीवन न बिता देना
उड़ने के लिए पर भी भगवान ने जोड़े हैं