दुर्गरक्षक द्वार पर दिख तो रहे हैं
जागने का है समय पर सो रहे
हैं
बस तुम्हारी ही कमर टूटी
नहीं है
बोझ दुष्टों का तो हम भी ढो रहे हैं
कोई चाहे तो भले कैंची चलाए
हम तो सूईयों में धागे पो रहे हैं
आप तो विषपायी शंकर के रसिक
हैं
आप काहे को हलाहल बो रहे है
यह भला कैसा नियोजन हो रहा
है
अ-प्रभावित भी प्रभावित हो रहे हैं
किस तरह ढाढस बँधाओगे उन्हें
तुम
डिग्रियाँ लेकर के भी जो रो रहे हैं
धर्म सुनते ही बिदक जाती है
पब्लिक
शब्द भी अब अर्थ अपने खो रहे हैं
बोझ दुष्टों का तो हम भी ढो रहे हैं
हम तो सूईयों में धागे पो रहे हैं
आप काहे को हलाहल बो रहे है
अ-प्रभावित भी प्रभावित हो रहे हैं
डिग्रियाँ लेकर के भी जो रो रहे हैं
शब्द भी अब अर्थ अपने खो रहे हैं
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