और कोई पल तो केवल काल की हलचल लगे
जिसमें हो अस्तित्व तेरा बस
वही पल, पल लगे
मातृ ममता को लुटाते, गुदगुदाते करकमल
इतना मीठा स्पर्श हरसिंगार सा कोमल लगे
तू जब आती है तो पुरवैया भी
आये संग संग
तेरे आँचल में धधकती आग भी शीतल लगे
स्वार्थ का आभास भी कर देता
है तुझको विकल
कौन है वैसा जगत में जैसी तू निश्छल लगे
तू नहीं तो इन्द्र के आसन का
भी मैं क्या करूँ
तू नहीं तो हर सफलता फल नहीं निष्फल लगे
निज-कृपा से धो दिया है मन
के सारे मैल को
माँ तेरा अपनत्व गंगा की तरह निर्मल लगे
इतना मीठा स्पर्श हरसिंगार सा कोमल लगे
तेरे आँचल में धधकती आग भी शीतल लगे
कौन है वैसा जगत में जैसी तू निश्छल लगे
तू नहीं तो हर सफलता फल नहीं निष्फल लगे
माँ तेरा अपनत्व गंगा की तरह निर्मल लगे
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