पंक्ति बनाकर बैठे हैं
पंछी कितने प्यारे हैं
पुण्य नहीं,ये
तो छल है
दाने जाल के नीचे हैं
हाथों में रहते ही नहीं
तोते उड़ ही जाते हैं
जीवन जोगी जैसा है
हम सब उसके झोले हैं
ना इंजन ना ही डब्बे
हम तो केवल कूपे हैं
सबके प्यारे हैं फिर भी
रजनीकान्त अकेले हैं
दाने जाल के नीचे हैं
तोते उड़ ही जाते हैं
हम सब उसके झोले हैं
हम तो केवल कूपे हैं
रजनीकान्त अकेले हैं
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