हे शुभांगी कोमलांगों का प्रदर्शन मत करो
ये ही सब करना है तो संस्कार-वाचन
मत करो
सृष्टि के आरम्भ ही से तुम
सहज स्वाधीन थीं
क्यों हुईं परवश, विचारो, मात्र रोदन मत करो
कौन है नारी का बैरी क्या
तुम्हें अनुभव नही
फिर भी लड़ना है परस्पर तो प्रभंजन मत करो
किसलिए तारा,
अहिल्या, द्रौपदी बनती हो तुम
मानिनी ऐसे स्वयं का मानमर्दन मत करो
तुम जगत की स्वामिनी हो तुम
अखिल-अधिकारिणी
हे सुरम्या तुम तो आज्ञा दो निवेदन मत करो
क्यों हुईं परवश, विचारो, मात्र रोदन मत करो
फिर भी लड़ना है परस्पर तो प्रभंजन मत करो
मानिनी ऐसे स्वयं का मानमर्दन मत करो
हे सुरम्या तुम तो आज्ञा दो निवेदन मत करो
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