ना तो निर्वाण का न उद्भव का
काल तो श्रेष्ठतम है शैशव का
बालपन जैसे गोपियों का प्रेम
और संसार ज्ञान उद्धव का
विश्वविजयी हमीं तो थे केवल
बोध था ही नहीं पराभव का
अब तो चलना भी हो गया दूभर
बोझ इतना है सर पै अनुभव का
तब तो सारे ही मित्र थे पर
अब
शत्रु मानव बना है मानव का
कोष में हो नहीं लड़कपन तो
मोल है शून्य सारे वैभव का
और संसार ज्ञान उद्धव का
बोध था ही नहीं पराभव का
बोझ इतना है सर पै अनुभव का
शत्रु मानव बना है मानव का
मोल है शून्य सारे वैभव का
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