अगर अमरित गटकना हो तो कतराते हैं माहेश्वर
मगर विषपान करना हो तो आ
जाते हैं माहेश्वर
कभी सरयू किनारे तो कभी
गोकुल की गलियों में
कभी राघव कभी कान्हा को दुलराते हैं माहेश्वर
स्वयं नटराज हैं, संगीत
के मर्मज्ञ हैं फिर भी
उमा जब थाप देती हैं तभी गाते हैं माहेश्वर
कभी जो विघ्न आ जाए तो इनका
ध्यान धर लेना
विघनहर्ता के बप्पाराम कहलाते हैं माहेश्वर
उलझ कर रह गयी थी जान्हवी
इनकी जटाओं में
उसी अनुभव से हर उलझन को सुलझाते हैं माहेश्वर
अ-पात्रों
को कभी वरदान दे भी देते हैं तो फिर
उन्हीं से नाक भी डटकर रगड़वाते हैं माहेश्वर
नवीन आयाम गढ़ते रहते हैं
प्राचीन तत्वों के
कभी जोगी कभी गोपेश बन जाते हैं माहेश्वर
कभी राघव कभी कान्हा को दुलराते हैं माहेश्वर
उमा जब थाप देती हैं तभी गाते हैं माहेश्वर
विघनहर्ता के बप्पाराम कहलाते हैं माहेश्वर
उसी अनुभव से हर उलझन को सुलझाते हैं माहेश्वर
उन्हीं से नाक भी डटकर रगड़वाते हैं माहेश्वर
कभी जोगी कभी गोपेश बन जाते हैं माहेश्वर
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