जो है गंगा जमुन की धारों में
बस वही भाव हों विचारों में
सब कथा जानते हैं ऋतुओं की
बुद्धि कितनी है देवदारों में
ब्रह्म जिज्ञासु है तो खोज
उसे
बाँसुरी, शंख, ढप, सितारों में
दान करने की होड़ हो तो हो
बैर होता नहीं उदारों में
भाव की बाट जोहते हैं नित
धैर्य कितना है शिल्पकारों में
खोज कर लायें चल पुनः उसको
जो गजल खो गयी है नारों में
बुद्धि कितनी है देवदारों में
बाँसुरी, शंख, ढप, सितारों में
बैर होता नहीं उदारों में
धैर्य कितना है शिल्पकारों में
जो गजल खो गयी है नारों में
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