मुँह में मिश्री घोलने वाली बोली में कब लिक्खोगे
हिन्दी के गुण गाने वालो
हिन्दी में कब लिक्खोगे
यद्यपि हर शैली अच्छी है
तद्यपि वाणी के प्यारो
शैलों को भी पिघला दे उस शैली में कब लिक्खोगे
घोर निराशा के भावों में
डूबे रहते हो पल-पल
अन्तस में आल्हाद जगाती मस्ती में कब लिक्खोगे
निस्सन्देह निशा का भी आनन्द
अनोखा है लेकिन
केसरिया रंगों वाली परभाती में कब लिक्खोगे
होली और दिवाली पर भेजे
होंगे संदेश मगर
पूजा कर के होली और दिवाली में कब लिक्खोगे
शैलों को भी पिघला दे उस शैली में कब लिक्खोगे
अन्तस में आल्हाद जगाती मस्ती में कब लिक्खोगे
केसरिया रंगों वाली परभाती में कब लिक्खोगे
पूजा कर के होली और दिवाली में कब लिक्खोगे
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