न तो उपकार की ना ही दया की दृष्टि से देखें
सभा की सुष्मिता को सभ्यता
की दृष्टि से देखें
कलेवर में कलेवर को ही बस
देखा तो क्या देखा
कला को देखना है तो कला की दृष्टि से देखें
दुखों की दिव्यता प्रत्येक
मस्तक पर सुशोभित है
समस्या को सदा सम्वेदना की दृष्टि से देखें
पढें तो वह पढें जो
पंक्तियों के मध्य अंकित है
दिवाकर चाहिये तो चेतना की दृष्टि से देखें
बिना सामर्थ्य के भी जो शिखर
को चूम लेता है
भगीरथ की कथा को दिव्यता की दृष्टि से देखें
जो सोचा ही नहीं होता तो
लोहा किस तरह उड़ता
दिवा-स्वप्नों को भी सम्भावना की दृष्टि से देखें
नये वृत्तों से जुड़कर ही
हमें विस्तार मिलता है
किसी भी सोच को सद्भावना की दृष्टि से देखें
कला को देखना है तो कला की दृष्टि से देखें
समस्या को सदा सम्वेदना की दृष्टि से देखें
दिवाकर चाहिये तो चेतना की दृष्टि से देखें
भगीरथ की कथा को दिव्यता की दृष्टि से देखें
दिवा-स्वप्नों को भी सम्भावना की दृष्टि से देखें
किसी भी सोच को सद्भावना की दृष्टि से देखें
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