आज व्याकुल कर दिया है मन
उसी आसक्ति ने दो चरण पश्चात ही आल्हाद का
प्रासादथा शोक से परिचय कराया
आलसी-आसक्ति ने
अन्यथा मन बालपन ही से
महाराजा रहा चित्त को चाकर बनाया वित्त
की आसक्ति ने एक था रावण अब उसका नामलेवा
भी नहीं वंश की लुटिया डुबोयी
आसुरी-आसक्ति ने बन्द करते ही नयन होते थे
प्रियतम के दरस भक्ति का भट्टा बिठाया शक्ति
की आसक्ति ने
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